क्या भारत में जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र है? अधिकार मालूम लेकिन कर्तव्य कोई नहीं जानता


नई दिल्ली: आज International Day Of Democracy यानी अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है. माना जाता है कि ढाई हजार वर्ष पहले ग्रीस में पहली बार लोकतंत्र की स्थापना हुई थी जबकि आज की तारीख में भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. इन ढाई हजार वर्षों में लोकतंत्र का स्वरूप कैसे बदला इसे आप भारत और ग्रीस की ही दो तस्वीरों से समझ लीजिए.

ग्रीस के लोग पिछले कई दिनों से कोरोना वायरस की वैक्सीन का विरोध कर रहे हैं. विरोध के नाम पर आगजनी की जा रही है, तोड़फोड़ की जा रही है. दूसरी तरफ भारत है, जहां वैक्सीनेशन के लिए मची भगदड़ की कई तस्वीरें पिछले कुछ दिनों में आपने भी जरूर देखी होंगी. लोकतंत्र के नाम पर ग्रीस, अमेरिका और फ्रांस जैसे विकसित देशों में लोग वैक्सीन की अनिवार्यता का विरोध करने लगते हैं.

कैसे आगे बढ़ा लोकतंत्र

भारत जैसे देश में लोग लाइन में ना लगने को ही लोकतंत्र मान लेते हैं. यानी इन विकसित देशों और भारत का लोकतंत्र कई बार..Too Much Democracy में बदल जाता है, जबकि इस समय दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जहां नाम मात्र का लोकतंत्र है और इसका खामियाजा उन देशों की जनता भुगत रही है.

उदाहरण के लिए आप लेबनान की तस्वीरें देखिए, जहां अस्थिर लोकतंत्र और सरकार की नीतियों की वजह लोगों को हजारों रुपये देकर ब्रेड का एक पैकेट मिल रहा है और गाड़ियों में पेट्रोल और डीजल भरवाने के लिए दस-दस किलोमीटर लंबी लाइनें लगी हैं. लेबनान के लचर लोकतंत्र का विश्लेषण हम आगे करेंगे लेकिन पहले देखिए पूरी दुनिया में इस समय लोकतंत्र की क्या स्थिति है.

20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में सिर्फ 11 लोकतांत्रिक देश थे. वर्ष 1920 में इनकी संख्या बढ़कर 20 हो गई, वर्ष 1974 में दुनिया में लोकतांत्रिक देशों की संख्या 74 थी. वर्ष 2006 में ये संख्या 86 तक पहुंच गई और आज 5 लाख से ज्यादा आबादी वाले दुनिया के 167 देशों में से 57 प्रतिशत यानी 96 देश खुद को लोकतांत्रिक देश कहते हैं.

डेमोक्रेसी डे मनाने में लगे हजारों साल

इसके अलावा 21 देशों में किसी ना किसी प्रकार की तानाशाही है, जबकि 28 देश ऐसे हैं जिनमें तानाशाही और लोकतंत्र दोनों के लक्षण हैं. संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2007 में International Day Of Democracy मनाने की शुरुआत की थी अब आप सोचिए दुनिया ने लोकतंत्र का पहला उदाहरण ग्रीस में ढाई हजार साल पहले देखा था जबकि लोकतंत्र को एक दिन समर्पित करने में दुनिया के सैंकड़ों देशों को हजारों वर्ष लग गए.

Economist Intelligence Unit के Democracy Index के मुताबिक दुनिया में सिर्फ 20 देश ऐसे हैं जहां सही मायनों में लोकतंत्र है जबकि 55 देश ऐसे हैं जो लोकतांत्रिक तो हैं लेकिन इन देशों के लोकतंत्र में कई कमियां हैं. कमियों वाले लोकतांत्रिक देशों में दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत भी शामिल है और दोनों ही देशों में स्थिति बहुत बुरी है.

आज हम लोकतंत्र की इन्हीं कमियों को दुरुस्त करने की बात कर रहे हैं. लेकिन यहां आपको एक बात समझनी होगी और वो ये कि लोकतंत्र का विपरीत हमेशा तानाशाही नहीं होता. जिन देशों में तानाशाही है वहां भी कई बार जनता सत्ता बदल डालती है और जिन देशों में लोकतंत्र है वहां भी कई बार नेता वर्षों तक सत्ता से चिपके रहते हैं.

तानाशाही में हुआ तख्तापलट

उदाहरण के लिए वर्ष 2010 में कई अरब देशों में वहां की हुकूमतों के खिलाफ बड़ी क्रांति की शुरुआत हुई थी. लेकिन ज्यादातर देशों को इससे कुछ खास हासिल नहीं हुआ. 2013 में इजिप्ट (मिस्त्र) में बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे, इस बीच सेना ने इन प्रदर्शनों को आधार बनाकर तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी का तख्ता पलट कर दिया था और इस तख्तापलट में शामिल रहे अब्देल फतह अल सिसी Egypt के नए राष्ट्रपति बन गए लेकिन इजिप्ट में सिर्फ राष्ट्रपति बदला तानाशाही नहीं गई, मोरसी हटा दिए गए और सिसी कुर्सी पर बैठ गए.

अरब स्प्रिंग का असर लीबिया, यमन और सीरिया जैसे देशों में भी हुआ और वहां भी बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए. लेकिन आज ये सभी देश गृह युद्ध की आग में जल रहे हैं. इराक में सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए अमेरिका ने इतना भयंकर युद्ध लड़ा. लेकिन इराक को सही मायनों में लोकतंत्र नहीं मिल पाया, 2011 में लीबिया के तानाशाह मुअम्मर अल गद्दाफी को मार गिराया गया. लेकिन 2014 से लीबिया में जो गृह युद्ध शुरू हुआ वो आज भी जारी है.

11 साल पहले ट्यूनीशिया (Tunisia) से अरब क्रांति की शुरुआत हुई थी, तब वहां एक सब्जी विक्रेता ने बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए खुद को आग लगा ली थी. इसके बाद अगले 28 दिनों तक ट्यूनीशिया में तत्कालीन राष्ट्रपति के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हुए और राष्ट्रपति को सत्ता से हटा दिया गया. लेकिन ट्यूनीशिया आज भी सही मायनों में लोकतंत्र बनने के लिए संघर्ष कर रहा है.

आसान नहीं लोकतंत्र की राह

यही हाल भारत के पड़ोसी देश म्यांमार का भी है, जहां 53 वर्षों के बाद 2015 में लोकतांत्रिक सरकार आई थी. लेकिन अब वहां एक बार फिर से सेना का शासन है. यानी किसी भी देश के लिए सच में एक लोकतंत्र बनने की राह आसान नहीं है और ये कामयाबी हासिल करने के लिए उस देश की सरकारों और लोगों को अथक प्रयास करने पड़ते हैं.

कुल मिलाकर दुनिया के देश इस समय 4 श्रेणियों में बंटे हुए हैं. पहली श्रेणी उन देशों की है जहां लोकतंत्र है, दूसरी श्रेणी में वो देश हैं, जहां हाइब्रिड डेमोक्रेसी (Hybrid Democracy) है. उदाहरण के लिए पाकिस्तान जहां वैसे तो लोकतांत्रिक सरकार है लेकिन नियंत्रण सेना का ही है. तीसरी श्रेणी उन देशों की है, जहां पूरी तरह से तानाशाही है जैसे नॉर्थ कोरिया और चीन. जबकि चौथी श्रेणी में वो देश आते हैं, जहां लोकतंत्र भी है और राजशाही भी है, जैसे ब्रिटेन, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड, जापान और थाईलैंड.

बगैर लोकतंत्र के भी देशों ने की तरक्की

इनमें से ज्यादातर देश लोकतंत्र के पैमानों पर कई देशों के मुकाबले बहुत ऊपर हैं. लेकिन फिर भी इन देशों का सर्वोच्च संवैधानिक पद राजघराने के लोगों के पास होता है. ये पद पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है. लेकिन इसी दुनिया में सिंगापुर, ताईवान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी हैं, जिन्होंने बिना लोकतंत्र के या बहुत कम लोकतंत्र के बावजूद असाधारण तरक्की की. इन देशों में ज्यादातर देश वर्ष 1950 के आस पास आजाद हुए थे और इन देशों में वर्ष 1990 तक या तो किसी एक व्यक्ति का शासन रहा या फिर इन देशों की कमान सेना के पास रही.

इन तीनों देशों की खास बात ये है कि जब ये देश विकास के पैमानों पर अमेरिका जैसे देशों को टक्कर देने लगे, इनकी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह से विकसित हो गईं और जब इन देशों के लोगों की आय, विकसित देशों के बराबर या उनसे भी ज्यादा हो गई तब इनका परिचय लोकतंत्र से कराया गया.

सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू लगातार 31 वर्षों तक वहां के प्रधानमंत्री रहे. इस दौरान सिंगापुर में विपक्षी नेताओं, प्रेस, लेबर यूनियन और विरोध प्रदर्शनों पर कई तरह की पाबंदिया थीं. यानी वहां नाम मात्र का लोकतंत्र था. फिर भी ली कुआन यू ने सिंगापुर को Third World Country से दुनिया के विकसित देशों में से एक बना दिया.

सिंगापुर ने साबित करके दिखाया

हालांकि सिंगापुर उस समय था तो लोकतंत्र ही लेकिन इस लोकतंत्र के साथ कई तरह की शर्तें लागू थीं. क्योंकि सरकार में आम जनता की भागीदारी को लेकर ली कुआन यू के विचार अलग थे. उन्होंने कहा था कि रवांडा, बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे देशों में भी लोकतंत्र है. लेकिन लोकतंत्र के बावजूद वहां का समाज सभ्य नहीं है. किसी भी देश के लोगों का सबसे पहले आर्थिक विकास होना चाहिए. वहां के नेता चाहे जो भी कहें, नागरिकों को घर, दवाइयां, नौकरी और स्कूलों की जरूरत है.

वर्ष 1980 में सिंगापुर एयरलाइन्स की पायलट यूनियन ने हड़ताल की थी. तब ली कुआन यू ने उनकी मांगों को मानने के बदले, उन्हें काम पर वापस लौटने की चेतावनी दी थी और ये भी कहा था कि अगर हड़ताल तुरंत खत्म नहीं हुई तो वो सिंगापुर एयरलाइन्स को बंद करके नए सिरे से शुरू करने के लिए तैयार हैं. इसके बाद हड़ताल खत्म हो गई थी. 

भारत को संतुलन साधने की जरूरत

यहां हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि लोकतंत्र को ऐसी ही सीमाओं में बांध देना चाहिए. हम सिर्फ ये कह रहे हैं बहुत कम लोकतंत्र और जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र के बीच एक संतुलन होना चाहिए. क्योंकि Too Little Democracy नागरिकों को संकट में डाल सकती है जबकि Too Much Democracy पूरे देश को संकट में डाल सकती है और आज भारत के सामने लोकतंत्र के इसी संतुलन को साधने की जरूरत है.

आज सिंगापुर, ताईवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में लोकतंत्र भी है. वहां के लोगों को कई देशों के मुकाबले ज्यादा अधिकार भी हासिल है. लेकिन इन लोगों को ये अधिकार तब हासिल हुए जब इन्होंने अनुशासन के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना सीख लिया.

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि उन अधिकारों के कोई मायने नहीं है जिनकी धारा कर्तव्य बोध से नहीं निकलती. उदाहरण के लिए आप किसी डॉक्टर के पास जाए और वो आप से कहे कि स्वस्थ रहना है तो आपको कड़वी दवाई खानी होगी और अनुशासन में रहकर डाइट लेनी होगी. अब ये आपकी मर्जी है कि आप डॉक्टर की बात मानें या ना माने. आप कह सकते हैं कि इस देश में लोकतंत्र है और डॉक्टर की बात ना मानना मेरा अधिकार है. लेकिन इससे नुकसान डॉक्टर को नहीं आपके स्वास्थ्य को होगा. असिमित अधिकारों और जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र का भी नुकसान ये है कि इससे एक राष्ट्र के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है.

जरूरत से ज्यादा आजादी के मायने

उदाहरण के लिए फरवरी 2020 में दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे. तब भीड़ इन दंगों के एक आरोपी के घर की छत पर पहुंच गई थी और वहां से इस भीड़ ने नीचे खड़े पुलिस वालों पर पेट्रोल बम फेंकने शुरू कर दिए थे. उसी वर्ष नए नागरिकता कानून के खिलाफ भी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन हुए थे और तब भी भीड़ ने पुलिस वालों पर ही हमला कर दिया था. ये तस्वीरें हमने आज आपको एक बार फिर से इसलिए दिखाई ताकि आप समझ पाएं कि जब लोकतंत्र और आजादी जरूरत से ज्यादा हो जाती है तो फिर क्या होता है.

दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहां आजादी का दायरा नियमों के मुताबिक बुना गया है. यहां आजादी तो लिमिटेड है लेकिन अनुशासन भी है. जैसे सिंगापुर में लोग Chewing Gum नहीं खा सकते. ये नियम इसलिए हैं ताकि लोग Chewing Gum खाकर सड़कों पर ना फेंके और इससे गन्दगी ना फैले. सिंगापुर में अगर कोई व्यक्ति पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल कर रहा है और वो बिना फ्लश करे बाहर आ जाता है तो ये गैर कानूनी माना जाता है. ऐसा करने पर 150 से 500 डॉलर्स यानी एक हजार रुपये से लेकर तीन हजार रुपये तक जुर्माना है.

इन देशों में लागू सख्त नियम

इसके अलावा सिंगापुर में 10 बजे के बाद किसी भी तरह का शोर करना, दूसरे व्यक्ति का Wifi इस्तेमाल करना और कबूतरों को दाना डालना भी गैर कानूनी है. इसी तरह डेनमार्क में लोग अपने बच्चों का नाम पहले से तय 7 हजार नामों में से ही रख सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति को कोई और नाम रखना है, तो इसके लिए वहां की सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है.

मेक्सिको में वर्ष 1892 से ये नियम है कि वहां लोग साइकिल चलाते समय पैडल से अपना पैर नहीं हटाएंगे. वहां की सरकार का मानना है कि ऐसा करने से साइकिल का सुतंलन बिगड़ जाता है और इससे दुर्घटनाएं हो सकती हैं. स्विट्जरलैंड में बिना कपड़ों के लोग पहाड़ों पर चढ़ाई नहीं कर सकते. ये नियम 2009 में बना था ताकि पहाड़ों पर रहने वाले लोग असहज ना हों.

वेनिस के सेंट मार्क स्क्वायर पर पक्षियों को दाना डालने पर प्रतिबंध है. ऐसा करने वालों पर 700 डॉलर्स यानी 52 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाता है. ये नियम पक्षियों से होने वाली बीमारी से लोगों को बचाने और वहां स्वच्छता बनाए रखने के लिए है. कनाडा के एक शहर पेट्रोलिआ में लोग Noise Pollution की वजह से किसी भी समय चिल्लाकर बात नहीं कर सकते, तेज आवाज में गाने नहीं गा सकते और सीटी भी नहीं बजा सकते. क्या भारत में ऐसे नियम लागू करना सम्भव है?

ग्रीस के राष्ट्रीय स्मारकों में लोग हाई हील्स पहन कर नहीं जा सकते. जर्मनी में अगर हाईवे पर कोई गाड़ी पेट्रोल खत्म होने की वजह से बन्द हो जाती है तो उस गाड़ी के मालिक पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. जर्मनी में हाइवे पर वाहनों के लिए कोई स्पीड लिमिट नहीं है, इसलिए ये नियम बनाया गया है. जबकि हमारा देश तो आज तक ये तय कर रहा है कि एक्सप्रेसवे पर गाड़ियों की कितनी अधिकतम स्पीड होनी चाहिए. कल ही मद्रास हाई कोर्ट ने केन्द्र सरकार के उस नोटिफिकेशन को खारिज कर दिया, जिसमें अधिकतम स्पीड 120 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई थी.

ऑस्ट्रेलिया के बार और पब में कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को ज्यादा शराब पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. ऐसा करने वालों पर भारी जुर्माना लगता है. लेकिन हमारे देश में ये काफी सामान्य सी बात है. हमारे देश में बहुत सारे लोग पड़ोसियों की आजादी का भी ख्याल नहीं रखते. किसी के भी घर या दुकान के बाहर गाड़ी पार्क कर देते हैं. Wrong Side Driving करते हैं. अपने घर का कचरा दूसरे घर की छत पर डाल देते हैं. तेज आवाज में गाने सुनते हैं और जब पड़ोसी इस पर आपत्ति जताते हैं तो बहुत से लोग कहते हैं कि हम अपने घर में कुछ भी करें, आपको क्या?

लाइन तोड़ने की आजादी लोकतंत्र नहीं

ऐसे ही लोग सड़कों पर भी गन्दगी करने में अपनी शान समझते हैं और लाइन तोड़ने को अपनी आजादी मानते हैं. लेकिन लाइन तोड़ना लोकतंत्र नहीं है और लोकतंत्र का मतलब लाइन में लग कर हर पांच साल में सिर्फ वोट डालना भी नहीं है. लोकतंत्र का सही अर्थ दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना है. लेकिन हमारे देश में लोग अपने अधिकारों को तो याद रखते हैं लेकिन कर्तव्यों को भूल जाते हैं.

कुल मिलाकर आप सब बहुत खुसकिस्मत हैं क्योंकि आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, जहां आपके पास आजादी ही आजादी है. भारत जैसे देश के परिपेक्ष में देखें तो कहा जाता है कि हमारे देश की खूबसूरती ही यहां का लोकतंत्र है. लेकिन बहुत से लोग ये भी कहते हैं कि हमारे देश में जो कमियां हैं, वो लोकतंत्र में जरूरत से ज्यादा आजादी की वजह से ही हैं. आज जरूरत से ज्यादा मिली इसी आजादी से होने वाले नुकसानों को समझने की जरूरत है.





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